जड़ों की उँगलियों में धरती की मिट्टी लपेटे
डालियों के कन्धों पर उठाये हुए पूरा आकाश
अडिग किन्तु सप्राण
मैं न देव हूँ न ही यक्ष हूँ
मैं एक वृक्ष हूँ

जब तुम
पहले-पहल दिखाई दिए थे पूर्व के झरोखे से
उस समय
छू रहे थे अंतहीन अंतरिक्ष
मेरी अभिलाषाओं के प्रतिबिम्ब


छोटी थी मेरी काया
किन्तु
छाया मोटी थी
अब
तृप्त हो गईं मेरी कामनाएँ
पा कर

तुम्हारी ऊष्मा का साहचर्य

जीवन के मध्यान्ह तक
संकुचित हुई सभी वासनाएँ
समर्पित हो गईं मेरे चरणों में


पर जैसे-जैसे ढलती है
तुम्हारे यौवन की हरियाली
और मेरी हरियाली का यौवन
सभी सोयी-दबी  वासनाएँ
पुनः फ़ैल रही हैं
विस्तार ले रही हैं
आतुर हैं
अंतरिक्ष को अपने बाहुपाश में लेने को


मुझे ऐसा लगता है
जीवन के पूर्वार्ध में
अतृप्ति से तृप्ति की ओर आती हुई वासनाएँ
तथा
जीवन के उत्तरार्ध में
तृप्ति से अतृप्ति की ओर जाती हुई कामनाएँ
समानांतर हैं|

पहली में चेष्टा है
विराट को व्यक्ति में बाँधने की
दूसरे में आतुरता है
व्यक्ति को विराट में खोलने की
एक में समर्पण ही जीवन है
दूसरी में जीवन ही समर्पण है|

Views: 24

Comment by tejwani girdhar on February 3, 2013 at 6:24pm

अति सुंदर

Comment by Ashok Jain on February 5, 2013 at 5:38pm

sundar

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