विजया एकादशी से सोमवती अमावस्या तक चतुर्दिवसीय विशेष महाषिवरात्रि पर्व

भारतीय ज्योतिष शास्त्र व नक्षत्र की गणना के अनुसार 10 वर्ष के बाद इस बार (महाशिवरात्रि-सोमवती अमावस्या) दो महापर्वों का विशिष्ट संयोग बना है। 10 मार्च को महाशिवरात्रि तथा 11 मार्च को अमावस्या होने से यह दोनों ही दिन शिव आराधना के लिए श्रेष्ठ हैं। इस बार विशेष संयोग भी यह है-विजया एकादश्योपरान्त क्षय-योग के कारण प्रदोष व त्रयोदशी का एकात्म योग बना है। इस तरह विजया एकादशी (8 मार्च 2013 ) से सोमवती अमावस्या (11 मार्च 2013) तक ‘‘शैव-वैष्णव-शाक्त’ स्वरूप त्रिवेणी विचारपूर्ण चतुर्दिवसीय विशेष अनुष्ठान महापर्व बना है।

शिव महापुराण के कोटिरुद्र संहिता के अनुसार रविवार व सोमवार के अधिपति देव भगवान शिव हैं। अतः इन दिनों में की गई साधना-आराधना विशिष्ट फलदायी होती है।
इस बार महाशिवरात्रि रविवार के दिन धनिष्ठा नक्षत्र व सिद्धि योग के साथ आ रही है। रविवार का दिन साधना के लिए श्रेष्ठ है। धनिष्ठा नक्षत्र में की गई साधना धन की प्राप्ति करवाती है। वहीं सिद्ध योग सुख-सौभाग्य की दृष्टि से महिलाओं के लिए शुभ फलदायी रहेगा।
इस वर्ष महाशिवरात्रि व सोमवती अमावस्या पंचाग के पांच अंगों के आधार पर विशिष्ट संयोग के साथ आ रही है। 2013 से पहले ऐसा संयोग 2003 में बना था। अगला संयोग ठीक 10 साल बाद 2023 में बनेगा। शिव आराधना के लिए दोनों ही दिन श्रेष्ठ हैं। महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की कृपा प्राप्ति के लिए हवनात्मक रूद्राभिषेक तथा शिवस्त्रोत, शिव कथा व रुद्र पाठ करना चाहिए।
तंत्र साधना के लिए महाशिवरात्रि स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। जिस प्रकार दीपावली व होली की रात्रि तंत्र साधना के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है। उसी प्रकार शिवरात्रि को तंत्र साधना दृष्टि से सिद्धियों को देने वाली रात माना गया है। ‘वैदिक तंत्र’ तथा अघोर पंथी इस रात्रि की प्रतीक्षा करते हैं।
अमावस्या सोमवार के दिन शततारका नक्षत्र व साध्य योग के साथ आएगी। इस दिन तीर्थ स्नान व पीपल के वृक्ष की परिक्रमा करने से घर में मनुष्य को सुख-समद्धि प्राप्त होती है। परिवार पर पितृ की कृपा बनी रहती है।
फाल्गुन वदी एकादशी विजया नाम से मानी जाती है, भोलेबाबा के आराध्य श्रीराम ने इसी एकादशी व्रत का अनुष्ठान करके लंका पर विजय पाई थी। पौराणिक आख्यान के अनुसार वकदालभ्य ऋषि ने सागर तट पर पूर्णावतार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से कहा था कि हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का उत्तम व्रत करने से निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे। इस व्रत की विधि यह है कि दशमी के दिन स्वर्ण, चाँदी, ताँबा या मिट्टी का एक घड़ा बनाएँ। उस घड़े को जल से भरकर तथा पाँच पल्लव रख वेदिका पर स्थापित करें। उस घड़े के नीचे सतनजा और ऊपर जौ रखें। उस पर श्रीनारायण भगवान की स्वर्ण की मूर्ति स्थापित करें। एकादशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान की पूजा करें। विजया एकादशी व्रतानुष्ठान के बाद श्रीराम ने महाशिवरात्रि पर सागरतट पर लिंगस्थापन कर रुद्राभिषेक किया, जो रामेश्वर-तीर्थ माना जाता है।
पद्मपुराण के पाताल खंड में आरण्यक ऋषि द्वारा शत्रुघ्न को जो जानकारी दी उसके अनुसार इन दिनों भयंकर युद्ध चल रहा था। फागुन कृष्ण द्वितीया को लक्ष्मण मेघनाद युद्ध प्रारंभ सप्तमी को लक्ष्मण मूच्र्छित हुए उपचार हुआ। इस घटना के कारण फागुन कृष्ण तृतीया से सप्तमी तक 5 दिन युद्ध विराम रहा। फागुन कृष्ण अष्टमी को वानरों ने यज्ञ विध्वंस किया, फागुन कृष्ण नवमी कोे मेघनाद के साथ लक्ष्मण का युद्ध प्रारंभ हुआ इस बीच श्रीताम ने विजया एकादशी का ब्रत रखा। द्वादशी को व्रत पारण किया और तेरस को युद्ध में लक्ष्मण ने मेघनाद को मार गिराया। इसके बाद फागुन कृष्ण चैदस (महा शिवरात्रि) को एक ओर श्रीराम ने रुद्राभिषेक किया वहीं दूसरी ओर रावण की यज्ञ दीक्षा ली अगले ही दिन अमावस्या को युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
इस आधार पर विजया एकादशी से लेकर अमावस्या तक 4 दिन विशेष महत्व के हैं। इस वार एकादशी- द्वादशी- त्रयोदशी का एक साथ होना व सोमवती अमावस्या का दुर्लभ संयोग इस चतुर्दिवसीय अनुष्ठान की निर्वचनीय महिमा की अनुभूति करायेगा।

-देवेश शास्त्री

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Comment by That's Me Editor on March 3, 2013 at 3:39pm

बहुत महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी आपने शास्त्री जी.

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