जब कौवे उग्र हो उठे

मदनमोहन तरुण

प्रकृति ने समस्त प्राणियों को कुछ ऐेसी शक्तियाँ प्रदान की हैं जो सामान्य स्थितियों में दिखाई नहीं देतीं परन्तु , किसी असाधारण रूप से उत्साह के क्षणों में, संकट की विरल घडि॰यों में या किसी असाधारण चुनौती के पलों में वे आकस्मिक रूप से प्रकट हो जाती हैं। ऐेसे क्षणों में एक कायरतम समझा जानेवाला प्राणी भी कुछ ऐसे असाधारण कार्य कर देता है कि हम दंग रह जाते हैं।

आज मैं आपको एक ऐसी ही घटना के बारे में बता रहा हूँ जिसे मैंने स्वयं अपनी आँखों के सामने घटित होते देखा , जिसे मैं कभी भुला नहीं पाया और उसकी रोमांचकारी स्मृति मुझे अब भी विदग्ध कर देती है।

मेरे एक मित्र ने बन्दूक खरीदी। उस खुशी में भाग लेने के लिए उन्होंने मुझे आमंत्रित किया। वे एक बहुत अच्छे निशानेवाज थे। अपनी पत्नी के साथ जब मैं उनके घर गया तो उन्होंने कहा चलिए निशाना लगाकर दिखाता हूँ। उनके घर के सामने पीपल का एक विशाल वृक्ष था। उस पर तरह - तरह के पक्षी रहा करते थे। उन पक्षियों में उस वृक्ष पर रहने वाले कौवों की संख्या सबसे बडी॰ थी। वे मुझे उसी वृक्ष के पास ले गये और बोले -'कहिए किस पर निशाना लगाऊँ ?'मैने सामने एक छिद्र की ओर संकेत करते हुए कहा कि वे वहाँ निशाना लगाएँ। परन्तु लगता है उन्होंने मेरी बात सुनी नहीं। जबतक मैं कुछ समझ पाता तबतक उन्होंने वृक्ष की एक डाली की ओर निशाना साध दिया और गोली चला दी जिससे तुरत एक कौवा घायल होकर नीचे गिर पडा॰ और चीत्कार करने लगा। मेरे मित्र ने बडे॰ गर्व से एक विजेता की भाँति मेरी ओर देखा और अपने शिकार को  खींच लाने के लिए घायल कौवे की ओर बढे॰। परन्तु यह क्या ! उनके घायल कौवे के पास पहुँचते- पहुँचते उन्हें सैंकडों॰ कौवों ने बुरी तरह घेर लिया और क्रुद्ध होकर काँव - काँव करने लगे। कुछ कौवों ने तेजी से उड॰ कर अपनी चोंच से उनके सिर पर आघात भी किया। वे अपना बचाव करने के लिए फिर से अपनी बन्दूक चलानेवाले थे। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मैं उन्हें खीचता हुआ घर के भीतर ले आया । वे सिर से बुरी तरह घायल हो चुके थे। हमलोग घंटा - दो- अंटा घर के भीतर बैठे रहे और सोचा कि अब वे चले जाएँगे, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। कौवों की भीड॰ लगातार बढ॰ती रही। मैंने एकसाथ इतने कौवे पहली बार देखे थे। कौवे चारों ओर उड॰ते हुए उग्रतापूर्वक चीत्कार करते रहे। कुछ ही देर के बाद घायल कौवा मर गया।

अबतक काफी समय बीत चुका था। मेरे बच्चों के स्कूल से लौटने का समय हो रहा था। मेरा वापिस लौटना जरूरी हो चला था। उन्हें यह सलाह देकर कि वे आज घर से बाहर न निकले , कलतक कौवे सबकुछ भूल जाएँगे और सब ठीक हो जाएगा ,हम वापस लौटने लगे। मन में भय था कि कौवे कहीं हमलोगों पर भी आक्रमण न कर दें। हमलोग अपने सिर पर कपडा॰ रखकर डरते - डरते बाहर निकले। परन्तु कौवे चारों ओर उड॰ते हुए काँव -काँव करते रहे किन्तु हमदोनों पर किसी ने आक्रमण नहीं किया।

किन्तु, मेरे मित्र के जीवन को कौवों ने हराम कर दिया। इस घटना के महीनों बाद तक वे उनका पीछा करते रहे और उन्हे जब मौका मिलता वे अपनी चोंच से उनके सिर पर आक्रमण कर देते। मेरे मित्र कौवों से बहुत डर चुके थे। कई बार वे वेश बदल कर यह सुनिश्चित करके घर से बाहर निकलते कि बाहर कोई कौवा नहीं है, परन्तु दरवाजे से उनके बाहर निकलते ही कहीं - - कहीं से कोई कौवा निकल आता और उनके सिर पर चोंच से आक्रमण कर उड॰ जाता।

अगले एक साल के भीतर मेरे उस युवा मित्र की मौत होगयी।

डाँक्टरों ने उनकी मौत का कारण सिर से बुरी तरह घायल होजाना बताया।

मैं आज भी उस घटना को याद कर सिहर उठता हूँ और सहज भाव से यह विश्वास नहीं कर पाता कि ऐसा भी हो सकता है !

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Comment by Jacqueline on March 4, 2013 at 7:02am

Bahut romanchkari aur adbhut ghatna hai. Anayaas aghaat kisee ko bhee ugr kar sakta hai.

Comment by That's Me Editor on March 5, 2013 at 10:56pm

is ghatna me sandesh hai jo achchha hai........

Comment by MadanMohan Tarun on March 5, 2013 at 10:57pm

TippaNi ke liye dhanyavaad...

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